सीखना और सिखाना
सीखना और सिखाना
दोनों ही शब्द एक दूसरे के पूरक हैं ।हम जानते हैं कि मानव तो क्या दुनिया का कोई भी जीव अपनीं माँ के पट से कुछ भी सीख कर नहीं आता, वह जो भी सीखता इस जमींन पर कदम रखने के बाद ही सीखता है।
इन्सान जन्म से लेकर मृत्यु तक हमेेशा, हर पल, कुछ_ना_कुछ सीखता ही रहता है। जीवन पर्यन्त इन्सान के ज्ञान में वृद्धि होती ही रहती है। वह हमेशा कुछ नया करता है व करने की कोशिश करता रहता है।
सीखने के प्रकार_
1. नकल से
2. अकल से ( प्रक्टिकली)
1. नकल से_ कोई भी इंसान भगवान/अल्लाह/ईसा का अवतार नहीं जो जन्म से ही सबकुछ सीख कर इस जमीं पर आये। बच्चा पैदा होने के बाद अपने आसपास के लोगों व वहाँ के बाताबरण से वहुत कुुछ उनकी नकल कर के ही सीखता है। हमने देखा है कि बच्चे जैसा उनके रिस्तेेेेदार बोलते हैं बैसा ही बोलकर उन्हेें चिडाते हैंं, इससे स्पष्ट होता है कि बच्चे नकल से सीखते हैं।
दूसरा पडाब सुरू होता है शाला के दाखिले से शाला में भी बच्चे अधिक_से_अधिक अध्यापकों की नकल करके ही सिखते हैं। क्योंकि शाला में हर कार्य को अध्यापक के बताये अनुसार ही किया जाता है।
जैसे_ वर्णमाला को बोलना भी नकल से ही सिखाया जाता है।
किसी काव्यपाठ को भी हाव-भाव के साथ शारीरिक गतिविधि के द्वारा बच्चों को सिखाना भी नकल के माध्यम से ही है।
2. अकल से_ हम सभी जानते हैं कि बच्चा नकल से ही नहीं अकल से भी सीखता है। आपने देखा होगा कि जब बच्चे के सामने पियानो रखदिया जाये और बच्चे से कुछ बटने दबवाई जायें तो वह बार बार अन्य-अन्य बटनों को दबाता है ।तथा हँँस कर आनंद लेता है एवं वह जाँच करता है कि अलग-अलग बटन से अलग-अलग सुर निकल रहा है।
वह माता-पता के डाँटने पर भी अपने खिलौने को खोलकर देखता है कि आखिर इसके अन्दर है क्या।
सिखाना_ बच्चे को या किसी को भी हम जब सिखाते हैं तो आप किसी को यह कहकर डरा दोगे की आप गलती करने वाले है तो शायद वो प्रयास भी नही करेगा , जब प्रयास नही करेगा तो वही सिख कैसे पायेगा । यह हमारे ऊपर है कि हमारी मानसिकता किसी को सिखाने की है या अपने ज्ञान की श्रेष्ठता कायम रखने की है । इसमे कोई संदेह नही है कि किसी का ज्ञान अच्छा हो सकता है अथवा बुरा हो सकता है लेकिन वह सर्वश्रेष्ठ है यह कह पाना मुश्किल है । किस को सर्वश्रेष्ठ कहे और किसको नहीं यह भी बडा पेचीदा सवाल है क्योंकि तुलना करने के लिए समान माहौल भी जरूरी है ।
उदाहरण के लिए एक व्यक्ति नंगे पैर दौड़ते हुए हार जाता है जबकि दूसरा व्यक्ति ट्रेक शूज पहन कर जीत जाता है वहाँ यह देखना दिलचस्प होगा कि रास्ते मे कंकड कितने थे । एक व्यक्ति 10 साल से मूर्ति बना रहा है और एक व्यक्ति पहली बार हथोडी पकड़ता है उन दोनो मे तुलना कैसै हो सकती है । अगर पहली बार हथोडी पकडने वाले को यह कह दिया जाये की आप नकारा हो तो यह न्यायोचित नही है क्योकि उसको आपने सीखने का मौका ही नही दिया । अगर उंगली पकडकर चलने का प्रयास करते हुए बच्चे को आपने यह कह कर डरा दिया की आप नही चल पाओगे तो शायद वह जीवन भर डर कर चलना ही नहीं सिखेगा। आपको उसे ऊंगली पकड कर चलना सिखाना पढेगा।
उसे वाध्य यंत्रों पर ऊंगली चलाने की, टेढे-मेढे आंगन में फुदकने की, जीवन के अच्छे-बुरे आचरणों की, जन्म-मृत्यु की, आग-पानी की, हँसने-रोने की, जीवन के कठिन रास्तों से निकलने की सिख देनी पढेगी। सिखाना ही पढेगा कि जीवन में किस प्रकार आगे बढना है।
दोनों ही शब्द एक दूसरे के पूरक हैं ।हम जानते हैं कि मानव तो क्या दुनिया का कोई भी जीव अपनीं माँ के पट से कुछ भी सीख कर नहीं आता, वह जो भी सीखता इस जमींन पर कदम रखने के बाद ही सीखता है।
इन्सान जन्म से लेकर मृत्यु तक हमेेशा, हर पल, कुछ_ना_कुछ सीखता ही रहता है। जीवन पर्यन्त इन्सान के ज्ञान में वृद्धि होती ही रहती है। वह हमेशा कुछ नया करता है व करने की कोशिश करता रहता है।
सीखने के प्रकार_
1. नकल से
2. अकल से ( प्रक्टिकली)
1. नकल से_ कोई भी इंसान भगवान/अल्लाह/ईसा का अवतार नहीं जो जन्म से ही सबकुछ सीख कर इस जमीं पर आये। बच्चा पैदा होने के बाद अपने आसपास के लोगों व वहाँ के बाताबरण से वहुत कुुछ उनकी नकल कर के ही सीखता है। हमने देखा है कि बच्चे जैसा उनके रिस्तेेेेदार बोलते हैं बैसा ही बोलकर उन्हेें चिडाते हैंं, इससे स्पष्ट होता है कि बच्चे नकल से सीखते हैं।
दूसरा पडाब सुरू होता है शाला के दाखिले से शाला में भी बच्चे अधिक_से_अधिक अध्यापकों की नकल करके ही सिखते हैं। क्योंकि शाला में हर कार्य को अध्यापक के बताये अनुसार ही किया जाता है।
जैसे_ वर्णमाला को बोलना भी नकल से ही सिखाया जाता है।
किसी काव्यपाठ को भी हाव-भाव के साथ शारीरिक गतिविधि के द्वारा बच्चों को सिखाना भी नकल के माध्यम से ही है।
2. अकल से_ हम सभी जानते हैं कि बच्चा नकल से ही नहीं अकल से भी सीखता है। आपने देखा होगा कि जब बच्चे के सामने पियानो रखदिया जाये और बच्चे से कुछ बटने दबवाई जायें तो वह बार बार अन्य-अन्य बटनों को दबाता है ।तथा हँँस कर आनंद लेता है एवं वह जाँच करता है कि अलग-अलग बटन से अलग-अलग सुर निकल रहा है।
वह माता-पता के डाँटने पर भी अपने खिलौने को खोलकर देखता है कि आखिर इसके अन्दर है क्या।
सिखाना_ बच्चे को या किसी को भी हम जब सिखाते हैं तो आप किसी को यह कहकर डरा दोगे की आप गलती करने वाले है तो शायद वो प्रयास भी नही करेगा , जब प्रयास नही करेगा तो वही सिख कैसे पायेगा । यह हमारे ऊपर है कि हमारी मानसिकता किसी को सिखाने की है या अपने ज्ञान की श्रेष्ठता कायम रखने की है । इसमे कोई संदेह नही है कि किसी का ज्ञान अच्छा हो सकता है अथवा बुरा हो सकता है लेकिन वह सर्वश्रेष्ठ है यह कह पाना मुश्किल है । किस को सर्वश्रेष्ठ कहे और किसको नहीं यह भी बडा पेचीदा सवाल है क्योंकि तुलना करने के लिए समान माहौल भी जरूरी है ।
उदाहरण के लिए एक व्यक्ति नंगे पैर दौड़ते हुए हार जाता है जबकि दूसरा व्यक्ति ट्रेक शूज पहन कर जीत जाता है वहाँ यह देखना दिलचस्प होगा कि रास्ते मे कंकड कितने थे । एक व्यक्ति 10 साल से मूर्ति बना रहा है और एक व्यक्ति पहली बार हथोडी पकड़ता है उन दोनो मे तुलना कैसै हो सकती है । अगर पहली बार हथोडी पकडने वाले को यह कह दिया जाये की आप नकारा हो तो यह न्यायोचित नही है क्योकि उसको आपने सीखने का मौका ही नही दिया । अगर उंगली पकडकर चलने का प्रयास करते हुए बच्चे को आपने यह कह कर डरा दिया की आप नही चल पाओगे तो शायद वह जीवन भर डर कर चलना ही नहीं सिखेगा। आपको उसे ऊंगली पकड कर चलना सिखाना पढेगा।
उसे वाध्य यंत्रों पर ऊंगली चलाने की, टेढे-मेढे आंगन में फुदकने की, जीवन के अच्छे-बुरे आचरणों की, जन्म-मृत्यु की, आग-पानी की, हँसने-रोने की, जीवन के कठिन रास्तों से निकलने की सिख देनी पढेगी। सिखाना ही पढेगा कि जीवन में किस प्रकार आगे बढना है।
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