मजदूर, मजदूरी और पल पल मरने को बेबस करती हुई गरीबी
मजदूर सांसारिक जीबन में अहम भूमिका निभाने बाली वह कडी है जो हर समय हर घडी दिन रात मेहनत कर राष्ट्र को विकास के पथ पर अग्रसर करती हुई।
किसी भी के देश के विकास में मजदूर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन फिर भी मजदूरों को उस देश के लिये बोझ समझा जाता रहा है। मजदूरी करना किसी का सौक नहीं होता बल्कि जीबन को आगे बढाने व अपना और अपने बच्चों का पेट भरने के लिये शहर शहर, गाँव गाँव, भटना, मजदूरी के लिये आमर लोगों के सामने हाथ फैलाकर मजदूरी माँगना, गिडगिडाना और हाथ जोड कर मजदूरी देने के लिये तैयार करना।
शहर की ऊँची ऊँची इमारतों में रहने वाले बडे धनाड्य लोगों को उन गरीब मजदूरों की मजबूरी का पता नहीं होता कि उनकी मजबूरी क्या है जो वह अपने घर को छोड इतनी दूर महानगरों या अन्य इन्डस्ट्रीयल एरियाऔं में हमारी मजदूरी करने के लिये हमारे सामने हाथ फैलाये खडे हैं। हम लोग इनकी मजबूरी पूरा फायदा उठाते हैं व मनमाने ढंग से कम पैसे में मजदूरी करवाते हैं।
तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के शासकीय कर्मचारी भी होते हैं मजदूर_ जो ब्यक्ति अपने परवार के पालन पोषण हेतु दिन रात पैसे के बदले दूूूसरों का काम करते हुए अपने परिवार से दूर रहकर मेहनतकस कार्य करता है।
हम जानते हैं कि अधिकतर शासकीय व प्रायवेट कर्मचारी भी इसी प्रकार अधिकारीयों की डाँट झेलते हुये बडी मेहनत से कार्य करता है।
मजदूर और शिक्षा
दिन रात पसीना बहाने के बाद भी मजदूर परिवारो को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, तथा आवास नसीब नही होता है । मजदूर शब्द का उपयोग हर उस शख्स के लिए किया जा सकता है जो पेट पालन के लिए उस जगह काम करता है जिसका मालिक कोई और है । यह साल मजदूरो के लिए सबसे मुस्किल रहा है तथा आने वाला समय और भी मुश्किल होने वाला है । हमे शायद पता ही नही था की देश मे कितने मजदूर है । लाखो मजदूर सडक पर बदहवास बच्चो को लेकर भूखे प्यासे दिखे तब समझ आया की मजदूर कितने है और किस हाल मे है । यह चिन्तन का विषय है कि मजदूरो के पसीने से मालिक तो अमीर हो जाते है लेकिन मजदुर बदहाल क्यो रहता है । हालांकि बदहाली के कुछ कारण मानव निर्मित भी हो सकते है मसलन नशा करना और बच्चो को नही पढाना, लेकिन यह सब माहौल के उपर निर्भर करता है । दृश्य आम है जहा मजदुर काम कर रहे है और पास ही उनके बच्चे खेल रहे है । यह सवाल उठ सकता है कि वो पढने क्यो नही जाते , शायद इसका कारण मजदुरो का एक जगह टिक कर नही रहना हो सकता है । लेकिन क्या हम ऐसा सिस्टम नही बना सकते जहा दिहाड़ी मजदुरो भले कही भी काम करे उसके बच्चो को शिक्षा की व्यवस्था की जाये , भले वो बार बार स्थान बदलता रहते हो ।
नशा_
मजदूर अधिकतर किसी ना किसी नशे का आदी होता है क्योंकि उनके इस नशा भरे जीवन में स्पस्ट देखा जा सकता है कि यह और कुछ नहीं अशिक्षा का प्रभाव है। मजदूर ग्रावों में झोंपड पट्टियो में व शहर में गंदी व बदबू से भरी बदबूदार बस्तीयों में मेहनत से परेशान और हतास होकर वह बेबसी भरे इस जीवन में कई तरह के नशों का आदी हो जाता है जिससे बहुत से मजदूरों की मौत कम उम्र में ही हो जाती है।
मजदूरों के उत्थान के लिये शासन व समाज दौनौं को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे।


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